डिंडौरी।आयुष्मान भारत योजना के नाम पर गरीब और जरूरतमंद ग्रामीणों को कथित तौर पर गुमराह कर जबलपुर ले जाने के मामले में प्रशासन की कार्रवाई के बाद अब पुलिस की जांच पर सबकी निगाहें टिक गई हैं। एसडीएम फरहान इरफान जमादार द्वारा बस और प्रचार वाहन पकड़े जाने तथा चार कथित दलालों सहित छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस की कार्रवाई केवल सामने आए चेहरों तक सीमित रहेगी या फिर इस पूरे खेल के पीछे सक्रिय कथित मास्टरमाइंड तक भी कानून के हाथ पहुंचेंगे?
गांव-गांव मुनादी कराकर निशुल्क इलाज का भरोसा दिलाना, ग्रामीणों को बस के माध्यम से जबलपुर स्थित सुखसागर अस्पताल ले जाने की तैयारी और उनके आयुष्मान कार्ड एवं दस्तावेज मांगने का मामला कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आखिर ग्रामीणों को जुटाने का आदेश किसने दिया? प्रचार वाहन किसके इशारे पर चल रहा था? बस की व्यवस्था किसने की? और इस पूरी गतिविधि के पीछे आर्थिक हित किसके जुड़े थे?
चार गिरफ्तारी से खत्म नहीं होगी जांच की जिम्मेदारी
चार कथित दलालों की गिरफ्तारी को पुलिस की शुरुआती कार्रवाई माना जा सकता है, लेकिन पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश होना अभी बाकी है। पुलिस को यह पता लगाना होगा कि इन लोगों के पीछे कौन-कौन सक्रिय था और ग्रामीणों को अस्पताल तक पहुंचाने की पूरी योजना किस स्तर पर तैयार की गई थी। मोबाइल कॉल डिटेल, व्हाट्सएप चैट, बैंक लेनदेन, प्रचार वाहन के संचालन और बस की व्यवस्था से जुड़े तथ्यों की जांच इस मामले में अहम साबित हो सकती है।
अस्पताल प्रबंधन की भूमिका भी हो जांच के दायरे में
मामले में जबलपुर के सुखसागर अस्पताल का नाम सामने आने के बाद अस्पताल से जुड़े एजेंटों, प्रचार व्यवस्था और मरीजों को लाने-ले जाने की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच जरूरी है। क्या अस्पताल प्रबंधन को इस प्रचार अभियान की जानकारी थी? क्या ग्रामीणों को अस्पताल तक लाने के लिए किसी प्रकार का कमीशन या प्रोत्साहन दिया जा रहा था? इन सवालों का जवाब जांच से ही सामने आएगा। फिलहाल अस्पताल प्रबंधन अथवा अन्य बड़े लोगों की संलिप्तता प्रमाणित नहीं हुई है, लेकिन जांच में किसी भी संभावित कड़ी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
गरीबों के हक पर सवाल, जनप्रतिनिधि आखिर कब जागेंगे?
आयुष्मान भारत योजना गरीब परिवारों के लिए गंभीर बीमारी के समय जीवनरक्षक सहारा है। ऐसे में योजना के नाम पर कथित तौर पर ग्रामीणों को गुमराह किए जाने का मामला सामने आना बेहद चिंताजनक है। सवाल यह भी है कि क्षेत्र के जनप्रतिनिधि इस गंभीर मामले में अब तक कितने सक्रिय हुए हैं? क्या कोई जनप्रतिनिधि पीड़ित ग्रामीणों की सुध लेकर उनकी मदद के लिए आगे आएगा या फिर गरीबों के इस मुद्दे पर भी राजनीतिक चुप्पी बनी रहेगी?
पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती—मास्टरमाइंड तक पहुंचना
अब पुलिस के सामने केवल एफआईआर और गिरफ्तारी तक कार्रवाई सीमित रखने के बजाय पूरे नेटवर्क की परतें खोलने की चुनौती है। ग्रामीणों के बयान, आरोपियों के मोबाइल फोन, कॉल डिटेल, वित्तीय लेनदेन, प्रचार सामग्री और अस्पताल से संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल से कई अहम तथ्य सामने आ सकते हैं।सबसे बड़ा सवाल यही है कि आयुष्मान के नाम पर गरीबों को गुमराह करने के कथित खेल में केवल चार लोग ही शामिल थे या इनके पीछे कोई बड़ा संगठित नेटवर्क भी काम कर रहा था? अब जनता को कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क के पर्दाफाश का इंतजार है।








