डिंडौरी। जनपद पंचायत अमरपुर में सरकारी राशि के कथित अनियमित भुगतान और निजी बैंक खातों में राशि हस्तांतरण के मामले में जिला पंचायत द्वारा की गई कार्रवाई अब एक नए सवाल के साथ चर्चा में है। सरकारी वित्तीय अनियमितता के मामलों में कार्रवाई के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाए जा रहे हैं। 13 मई 2026 को पारित जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, विहित प्राधिकारी के आदेश में जनपद पंचायत अमरपुर के एकल खाते से वर्ष 2020-21 से 2025-26 के बीच कुल 40 लाख 76 हजार 657 की राशि दिनेश तेकाम के व्यक्तिगत बैंक खातों में हस्तांतरित होने का उल्लेख है। जांच के दौरान 9 लाख 84 हजार 984 की राशि ब्याज सहित वापस जमा कराए जाने के बाद 30 लाख 91 हजार 673 की देयता अलग-अलग व्यक्तियों पर निर्धारित की गई। आदेश के अनुसार सरोधन सिंह पर 2,03,662.50, आधार सिंह कुशराम पर 9,64,491, लोकेश नारनौरे पर 3,77,683 तथा दिनेश तेकाम पर 15,45,836.50 की देयता निर्धारित की गई है। दूसरी ओर तत्कालीन प्रशासनिक प्रभार से जुड़े रामजीवन कुमार वर्मा, सहायक परियोजना अधिकारी (संविदा) के संबंध में आदेश में भुगतान संबंधी नस्तियों के परीक्षण एवं अनुमोदन की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए उनके विरुद्ध पृथक कारण बताओ सूचना पत्र जारी कर अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने के निर्देश दिए गए, लेकिन उनके विरुद्ध इसी आदेश में कोई वित्तीय देयता निर्धारित नहीं की गई। वहीं जनपद पंचायत समनापुर में संबल योजना में अनियमितता बरतने वाले एक बाबू और कम्प्यूटर आॅपरेटर को जेल की हवा खानी पडी। इसके अलावा जनपद डिंडौरी की ग्राम पंचायत कसईसोंढा और रकरिया के तत्कालीन सरपंचों को भी शासकीय धन में गडबडी का दोषी करार देते हुए सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया।
दोहरा मापदंड आखिर क्यों?
यही वह बिंदु है जहां पूरे मामले का नया और गंभीर सवाल सामने आता है। यदि एक ही वित्तीय अनियमितता में अलग-अलग स्तरों पर अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की जांच की गई और कुछ पर लाखों रुपये की देयता निर्धारित की गई, तो जिन अधिकारियों की भूमिका नस्ती परीक्षण, भुगतान प्रक्रिया अथवा प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़ी बताई गई है, उनकी जवाबदेही का निर्धारण समान कसौटी पर क्यों नहीं किया गया? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी वित्तीय अनियमितता के अन्य मामलों में प्रशासन द्वारा अपेक्षाकृत कठोर कार्रवाई किए जाने के उदाहरण सामने आते रहे हैं। भूतपूर्व सरपंचों के विरुद्ध वित्तीय अनियमितताओं के मामलों में आपराधिक कार्रवाई और गिरफ्तारी तक हुई है। जनपद पंचायत समनापुर से जुड़े एक मामले में भी राशि जमा किए जाने के बावजूद थ्प्त् एफआईआर दर्ज किए जाने तथा संबंधित लिपिक को और आॅपरेटर को जेल भेजे जाने की कार्रवाई का उदाहरण सामने आता है। ऐसे में अमरपुर प्रकरण में कार्रवाई के स्तर को लेकर स्वाभाविक रूप से सवाल उठ रहे हैं कि समान प्रकृति के मामलों में कार्रवाई की कसौटी क्या है?
जांच का दायरा सीमित रहना पर्याप्त नहीं
अमरपुर मामले में यदि जांच में यह सामने आया कि सरकारी राशि निजी खातों तक पहुंची, कई वाउचर अस्पष्ट थे तथा कुछ भुगतानों में सक्षम स्वीकृति, बिल, सब-वाउचर और इनवॉइस उपलब्ध नहीं थे, तो केवल राशि प्राप्त करने वाले व्यक्ति तक जांच सीमित रहना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। पंचायत दर्पण, ई-ग्राम स्वराज की भुगतान व्यवस्था में प्रथम एवं द्वितीय सिग्नेचरी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में प्रत्येक भुगतान की डिजिटल स्वीकृति, लॉग, नस्ती परिसंचरण, वाउचर, बिल, अनुमोदन तथा बैंक ट्रांजेक्शन को अधिकारीवार मिलान किए जाने की आवश्यकता है। इससे यह स्पष्ट होगा कि राशि जारी होने से पहले किस स्तर पर कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई और किस अधिकारी की क्या भूमिका थी।
रामजीवन वर्मा की भूमिका पर भी स्पष्ट हो जवाब
आदेश में तत्कालीन प्रशासनिक प्रभार से जुड़े रामजीवन कुमार वर्मा के संबंध में नस्तियों के परीक्षण एवं अनुमोदन की प्रक्रिया का उल्लेख किए जाने के बावजूद उन पर वित्तीय देयता निर्धारित नहीं किए जाने से भी सवाल उठता है। यदि उनके पास वित्तीय प्रभार नहीं था, तो प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि भुगतान संबंधी नस्तियां उनके स्तर तक किस अधिकार और प्रक्रिया के तहत पहुंचती थीं तथा उनके द्वारा उनका परीक्षण किस सीमा तक किया जाता था। और यदि उनके स्तर से नस्तियों का परीक्षण अथवा भुगतान प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में कोई भूमिका थी, तो उस भूमिका का परीक्षण किस आधार पर किया गया? कारण बताओ नोटिस और वित्तीय देयता इन दोनों के बीच प्रशासन ने कौन-सा विधिक एवं तथ्यात्मक अंतर माना, इसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
लोकेश नारनौरे की वर्तमान पदस्थापना पर भी उठे सवाल
मामले में लोकेश नारनौरे, तत्कालीन, संबंधित अवधि के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत अमरपुर की भूमिका को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं। आदेश में उनके विरुद्ध 3,77,683 की देयता निर्धारित की गई है। यदि निर्धारित देयता की राशि उनके द्वारा शासन के खाते में जमा की गई है, तो यह तथ्य प्रशासनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है। हालांकि देयता निर्धारित होना अपने आप में आपराधिक गबन सिद्ध होने के समान नहीं है, लेकिन ऐसी स्थिति में उनकी वर्तमान पदस्थापना को लेकर प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा की मांग जरूर उठ सकती है। विशेषकर तब, जब संबंधित अधिकारी उसी जनपद पंचायत अमरपुर में वर्तमान में मुख्य कार्यपालन अधिकारी के पद पर कार्यरत हों। सवाल यह है कि जिस अधिकारी के विरुद्ध इसी प्रकरण में वित्तीय देयता निर्धारित की गई, उसी अधिकारी को उसी संस्था में पुनः महत्वपूर्ण वित्तीय एवं प्रशासनिक दायित्व पर बनाए रखने का औचित्य क्या है। पूरे मामले में अब जिला प्रशासन और जिला पंचायत से मांग उठ रही है कि अमरपुर प्रकरण की नस्तीवार एवं भुगतानवार पुनः समीक्षा कर अधिकारीवार जिम्मेदारी स्पष्ट की जाए। प्रत्येक भुगतान के डिजिटल रिकॉर्ड, प्रथम एवं द्वितीय सिग्नेचरी, नस्ती परिसंचरण, बैंक स्टेटमेंट और संबंधित स्वीकृतियों का मिलान कराया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि रामजीवन कुमार वर्मा के विरुद्ध केवल कारण बताओ नोटिस और अन्य अधिकारियों पर वित्तीय देयता निर्धारित करने का आधार क्या था।









