डिंडौरी। अमरपुर जनपद पंचायत में शासकीय राशि के बड़े गबन का मामला सामने आया है। यहां पदस्थ प्रभारी सहायक लेखाधिकारी दिनेश टेकाम पर आरोप है कि उसने तीन अलग-अलग जनपद सीईओ के कार्यकाल में योजनाओं की करीब 50 लाख रुपये की राशि अपने निजी बैंक खातों में ट्रांसफर कर ली। मामला तब उजागर हुआ जब जबलपुर से आई ऑडिट टीम ने खातों की जांच में गड़बड़ी पकड़ ली। खुलासे के बाद आरोपी बाबू अक्टूबर 2025 से अवकाश पर जाकर गायब बताया जा रहा है।
जिला पंचायत द्वारा गठित जांच समिति ने भी प्रथम दृष्टया गबन की पुष्टि कर दी है। इसके बावजूद अब तक न एफआईआर दर्ज हुई है और न ही पूरी राशि की वसूली हो सकी है। मामले में अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
अनुकंपा नियुक्ति से लेखाधिकारी तक का सफर
जानकारी के अनुसार मंडला निवासी दिनेश टेकाम को 22 जून 2012 को पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति पर सहायक ग्रेड-3 के पद पर अमरपुर जनपद पंचायत में पदस्थ किया गया था। वर्ष 2020 में उसे प्रभारी सहायक लेखाधिकारी का प्रभार सौंपा गया। आरोप है कि इसके बाद ही शासकीय राशि निजी खातों में ट्रांसफर करने का सिलसिला शुरू हुआ।
हर साल बढ़ती गई गड़बड़ी
दस्तावेजों के अनुसार
वर्ष 2020-21 में 5,950 रुपये
वर्ष 2021-22 में 17,078 रुपये
वर्ष 2022-23 में 1,01,019 रुपये
निजी खाते में ट्रांसफर किए गए।
उस दौरान जनपद पंचायत अमरपुर में आधार सिंह कुशराम सीईओ थे। इसके बाद नवंबर 2023 से जनवरी 2024 तक प्रशासनिक प्रभार रामजीवन वर्मा और वित्तीय प्रभार तत्कालीन अपर कलेक्टर सरोधन सिंह के पास रहा। इसी अवधि में करीब 24.48 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए।
फरवरी 2024 से जुलाई 2025 तक वर्तमान जनपद सीईओ लोकेश कुमार नारनोरे के कार्यकाल में भी लाखों रुपये निजी खातों में भेजे गए।
ऑडिट टीम ने खोली परतें
जुलाई 2025 में जबलपुर से आई ऑडिट टीम ने ई-ग्राम स्वराज और पंचायत दर्पण पोर्टल के भुगतानों का मिलान किया। जांच में पता चला कि कई भुगतान सीधे प्रभारी लेखाधिकारी के निजी खातों में किए गए थे।
जांच में सामने आया कि बैंक ऑफ बड़ौदा डिंडौरी खाते में 18.49 लाख रुपये,एसबीआई अमरपुर खाते में 22.27 लाख रुपये जमा किए गए।ऑडिट टीम को पोर्टल पर अपलोड कई वाउचर धुंधले मिले। जो दस्तावेज स्पष्ट थे, उनमें “इलाज”, “भाई की शादी”, “बेटी के चैक कार्यक्रम” और “आवश्यकता अनुसार भुगतान” जैसे उल्लेख दर्ज पाए गए।
बिना सीईओ अनुमति संभव नहीं था भुगतान
जांच में यह भी सामने आया कि भुगतान ईपीओ प्रक्रिया से किए गए, जिसमें लेखाधिकारी और जनपद सीईओ दोनों के डिजिटल हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। यानी बिना वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति भुगतान संभव नहीं था।
जब रिकॉर्ड मांगा गया तो दिनेश टेकाम कोई मूल दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। बाद में उसने करीब 9.84 लाख रुपये वापस जमा किए और 12 अक्टूबर 2025 से अवकाश लेकर फरार हो गया।
जांच समिति ने माना सुनियोजित गबन
मामला सामने आने के बाद जिला पंचायत सीईओ दिव्यांशु चौधरी ने चार सदस्यीय जांच समिति गठित की। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भुगतान के लिए कोई वैध स्वीकृति या दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।
रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि पंचायत दर्पण पोर्टल पर भुगतान के लिए लेखाधिकारी और जनपद सीईओ दोनों के संयुक्त डिजिटल हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं, इसलिए मामला प्रथम दृष्टया सुनियोजित गबन प्रतीत होता है।
अधिकारियों ने एक-दूसरे पर डाली जिम्मेदारी
जांच समिति में शामिल एडिशनल सीईओ पंकज जैन ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से स्पष्ट है कि शासकीय राशि का दुरुपयोग लेखाधिकारी और जनपद सीईओ की मिलीभगत से हुआ।
वहीं तत्कालीन वित्तीय प्रभार संभालने वाले सरोधन सिंह ने स्वीकार किया कि विधानसभा चुनाव के दौरान व्यस्तता के कारण संभवतः डीएससी और ओटीपी साझा किए गए होंगे। उन्होंने इसे “गलती” माना।
दूसरी ओर तत्कालीन प्रशासनिक सीईओ रामजीवन वर्मा ने किसी भी भूमिका से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने कोई भुगतान स्वीकृत नहीं किया।
सबसे बड़ा सवाल — अब तक एफआईआर क्यों नहीं?
ऑडिट रिपोर्ट और जांच समिति दोनों गड़बड़ी की पुष्टि कर चुकी हैं। इसके बावजूद अब तक न तो एफआईआर दर्ज हुई है और न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई बड़ी कार्रवाई हुई है।अब सवाल यह उठ रहा है कि करोड़ों की पंचायत योजनाओं से जुड़े इस कथित गबन मामले में प्रशासन आखिर कब तक कार्रवाई करेगा।










