डिंडौरी।जिले में शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत सरकारी दावों को झुठला रही है। एक ओर शासन “शाला प्रवेश उत्सव” और “हम सब पढ़ें” जैसे अभियानों के माध्यम से शिक्षा के विस्तार की बात करता है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को अब भी झोपड़ियों में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है।विकासखंड समनापुर के करेली टोला में संचालित प्राथमिक शाला इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहां पिछले सात महीनों से बच्चे एक घास-फूस की झोपड़ी में पढ़ाई कर रहे हैं। पुराना स्कूल भवन जर्जर और खंडहर हो जाने के बाद प्रशासन ने उसे गिरा तो दिया, लेकिन उसके स्थान पर नया भवन या वैकल्पिक व्यवस्था अब तक नहीं की गई।

स्कूल में वर्तमान में 19 बच्चे अध्ययनरत हैं। झोपड़ी में पढ़ाई के कारण बच्चे स्कूल आने से हिचकिचाने लगे हैं। शिक्षकों ने बच्चों की शिक्षा बाधित न हो, इसलिए अपने निजी खर्च से झोपड़ी बनवाकर पढ़ाई जारी रखी है।
ग्रामीणों ने इस समस्या को लेकर कई बार अधिकारियों और विधायक ओमकार मरकाम तक अपनी बात रखी, लेकिन आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इस लापरवाही से बच्चों की शिक्षा तो प्रभावित हो ही रही है, साथ ही हादसे की आशंका भी बनी हुई है।स्थानीय अभिभावकों और शिक्षकों का कहना है कि “सरकार भले ही शिक्षा को प्राथमिकता देने की बात करती हो, पर करेली टोला जैसे गांवों में स्थिति ठीक इसके उलट है।”जरूरी है कि शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन तत्काल संज्ञान लेकर करेली टोला के बच्चों को सुरक्षित और स्थायी भवन उपलब्ध कराए, ताकि वे भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार प्राप्त कर सकें और किसी अप्रिय घटना से बचा जा सके।











