डिंडौरी। जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर अमरपुर के रामगढ़ में स्थित शहीद वीरांगना रानी अवंती बाई की कर्मभूमि उपेक्षा का शिकार है। औपचारिकता के तौर पर वीरांगना की जयंती और शहीद दिवस के अवसर पर मंच से घोषणा तो कर दी जाती है। लेकिन आज तक इन घोषणाओं पर अमल नहीं होना अचरज का विषय है। पूर्व में की गई घोषणा के मुताबिक अभी तक एक अष्टधातु की मूर्ति भी स्थापित नहीं की गई है। विदित होवे कि 20 मार्च 1988 शहीद दिवस पर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह शिरकत करते हुए रानी को श्रद्धांजलि अर्पित कर मूर्ति लगाने की एवं सौंदर्यीकरण की स्वीकृति दी थी। जिसके तारतम्य में कंक्रीट की मूर्ति बना दी गई थी। जिसके खंडित होने पर मरम्मत करा दी जाती हैं। जिसका इतने वर्षों में आज तक लोकार्पण नहीं हो सका है। जानकारी के मुताबिक स्थानीय समिति द्वारा अनेकों बार अष्टधातु की बड़ी मूर्ति लगाने की मांग शासन प्रशासन से की जा चुकी हैं। लेकिन इस और किसी का ध्यान ही नहीं गया और वीरांगना की नगरी आज भी अपेक्षित हैं।
रानी का संक्षिप्त जीवन परिचय
रानी अवंती बाई का जन्म 16 अगस्त 1831 को जमींदार राव जुझार सिंह जिला सिवनी के मनखेड़ी ग्राम में हुआ, जिनका विवाह 1848 में रामगढ़ के राजकुमार विक्रमाजीत से हुआ और रानी बनकर रामगढ़ में पदार्पण हुआ। रानी के ससुर की मृत्यु के बाद विक्रमाजीत ने रामगढ़ रियासत की जिम्मेदारी संभाली ही थी कि अचानक अज्ञात बीमारी ने घेर लिया। इसी बीच रानी अवंती बाई के दो राजकुमार हो गए। बड़े का नाम अमान सिंह एवं छोटे का नाम शेर सिंह था। राजा के अस्वस्थ होने के कारण रानी की जिम्मेदारी और बढ़ गई थी। इसी समय अंग्रेजों की हड़पनीति की शुरुआत हुई। अंग्रेजों ने अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर दिए जोकि रानी को नागवार गुजरा और अंग्रेज प्रतिनिधि को अपने राज्य से बाहर कर दिया। जिसे अंग्रेजों ने अपने प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया और अंग्रेजी सेना द्वारा रामगढ़ में चढ़ाई कर दी। रानी ने भी अपने सैनिकों के साथ पूरे हौंसले के साथ अंग्रेजों के प्रशिक्षित सेना के साथ लड़ी और अंग्रेजी सेना को परास्त कर दिया और जनरल वाडिंगटन को पकड़ लिए। वाडिंगटन के गिडगिडाने के बाद रानी ने छोड़ दिया। अंग्रेजी सेना ने दोबारा पूरी तैयारी के साथ रामगढ़ राज्य में चढ़ाई कर दी। जिसकी उम्मीद रानी अवंती बाई को बिल्कुल भी नहीं थी। फिर भी आगे बढ़ते हुए अंग्रेजी सेना से घमासान युद्ध करते हुए बालपुर तक पहुंचे और पीछे से रीवा रियासत की सेना अंग्रेजों के सहयोग में आकर रानी को चारों तरफ से घेर लिए। तभी रानी अवंतीबाई अपने आप को असुरक्षित समझा और उसने अपने अंगरक्षक से कटार लेकर अपने पेट में भौंक लिया इसके बाद अंगरक्षक उमराव सिंह के निर्देश पर रानी को अचेत अवस्था में खाट की डोली में रामगढ़ लाते समय सूखी तलैया के पास रानी अवंती बाई ने अंतिम सांस ली और वह काला दिन 20 मार्च 1958 का था। जिसे रानी के बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
अनकों घोषणाओं के बाद नहीं कराया गया कार्य
रानी की कर्मभूमि रामगढ़ जोकि शासन प्रशासन की उपेक्षा का शिकार हैं। 25 दिसंबर 2009 को लोधी समाज के वार्षिक सम्मेलन मंडीदीप भोपाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान द्वारा घोषणा की गई थी कि रानी अवंती बाई का स्मृति समारोह हर साल शासकीय खर्च पर रामगढ़ में आयोजित होगा। लेकिन घोषणा के साथ रामगढ़ को ही भूल गए। इसी प्रकार 20 मार्च 2023 में स्थानीय समिति द्वारा आयोजित शहीद दिवस समारोह में पधारे तत्कालीन केंद्रीय राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते द्वारा मंच से समिति के मांग पत्र पर महाविद्यालय अमरपुर का नाम रानी अवंती बाई शासकीय महाविद्यालय किया जाएगा। लेकिन आज तक इस घोषणा पर अमल नहीं हो सका हैं।
वीरांगना रानी अवंतीबाई की कर्मभूमि रामगढ़ आज भी उपेक्षा की शिकार…कल मनाया जाएगा रानी का बलिदान दिवस
Updated On: March 19, 2026 7:39 pm
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