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कलयुग में श्रवण कुमार की जीवंत मिसाल बना सुदामा..मां की इच्छा पूरी करने व्हीलचेयर पर करा रहे मां नर्मदा की परिक्रमा

Kashi Agrawal

डिंडोरी।आज के समय में जब अधिकांश लोग अपने जीवन और सुविधाओं तक सीमित हो गए हैं, ऐसे दौर में इंदौर निवासी सुदामा योगीनाथ ने पुत्र धर्म और मातृ सेवा की ऐसी मिसाल पेश की है, जो सीधे रामायण काल के श्रवण कुमार की याद दिलाती है। 62 वर्षीय सुदामा अपनी 89 वर्षीय मां रामकली को व्हीलचेयर पर बैठाकर मां नर्मदा की परिक्रमा करा रहे हैं।

सुदामा योगीनाथ इंदौर के भागीरथ पुरा क्षेत्र के निवासी हैं और पेशे से सिक्योरिटी गार्ड हैं। वर्षों से उनके मन में नर्मदा परिक्रमा की इच्छा थी। चार वर्ष पूर्व वे अपने पैतृक गांव सागर जिले के केडी भाभूका तक भी पहुंचे, लेकिन तभी उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का अहसास हुआ। सबसे छोटी बेटी की शादी शेष थी, इसलिए वे परिक्रमा स्थगित कर घर लौट आए और पहले अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन किया।लगभग ग्यारह वर्षों से नमकीन क्लस्टर में कार्यरत सुदामा ने अपने दोनों पुत्र सूरज और हरिओम तथा बेटी किरण की शादी पहले ही कर दी थी। वर्ष 2024 में छोटी बेटी मुस्कान की शादी पूरी होते ही उनकी वर्षों पुरानी इच्छा फिर जागृत हुई। इसी दौरान मां रामकली ने भी नर्मदा परिक्रमा की इच्छा जताई। मां की बात सुनते ही सुदामा ने बिना किसी संकोच के उनके साथ परिक्रमा पर निकलने का संकल्प लिया।

मां-बेटे ने अप्रैल माह में ओंकारेश्वर से मां नर्मदा की परिक्रमा प्रारंभ की। सुदामा दिन-रात मां की सेवा करते हुए व्हीलचेयर के सहारे कठिन रास्तों पर आगे बढ़ रहे हैं। वर्तमान में वे डिंडोरी से मंडला की ओर परिक्रमा पथ पर हैं।रविवार को मंडला बस स्टैंड के पास सुबह लगभग 11 बजे जैसे ही लोगों को इस भावुक कर देने वाली यात्रा की जानकारी मिली, बड़ी संख्या में लोग उन्हें देखने पहुंचे। किसी ने फल-फूल भेंट किए, किसी ने सहयोग स्वरूप आर्थिक सहायता दी, तो कई श्रद्धालुओं ने सुदामा के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया।स्थानीय नागरिक रवि सिंह कहते हैं कि कलयुग में जब बच्चे माता-पिता को समय देना भी भूलते जा रहे हैं, ऐसे समय में सुदामा ने यह सिद्ध कर दिया कि माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा तीर्थ है। उनकी यह यात्रा केवल नर्मदा परिक्रमा नहीं, बल्कि संस्कार, सेवा और श्रद्धा की जीवंत कथा बन चुकी है।सुदामा योगीनाथ का यह कार्य समाज को यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति मंदिरों में नहीं, बल्कि मां-बाप के चरणों में होती है।

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